Friday, June 3, 2016

समय का सच ।

बेदर्द हो चुके
समय के साथ 
रक्त संबंध रिश्ते 
नही कर पाते
बाहरी अहसास 
विगत संजोए जर्जर टुकडे 
आस्था सहारा ढूँढते पल
अपनो से
नही मिल सका भीतरी
ममत्व कि संस्कृति बने
ओर नव पीढी 
ले सके संस्कारों की सीख
अपने घर से
किताबे नही सार्थक 
संसाधनो की क्रांति बीच
अस्तित्व अपूर्ण सा 
नही टटोली जाती
विधालय शिक्षा अतिरिक्त 
कही ओर
अनजान त्रासदी झेलता युग
चकाचौंध हुआ 
भूलता जाता स्व नीजता
रिश्ते के दर्द 
अब मात्र दिखावा 
भीतर बहुत गहरे विभत्स घृणा 
धूमिल करता व्यक्तित्व 
नफरत का दम घौटूं धुँआ 
जहर भरता सारे रिश्तो मे
क्या हो चेतना का
रही कहां स्वयं की
आराम पसंदगी सभ्य जीवन 
लेता रहता प्रेरणा 
टी वी सीरीयल से
जहां यथार्थ के नाम 
विघटित परिवार रिश्तों की
अतिशयोक्ति भरती स्वार्थ की जेब 
स्वता बिना यह तरक्की 
नित्य डरावनी लगती 
पहचाना होगा अपने बूते 
समय का सच
छगन लाल गर्ग