Friday, June 3, 2016

जीवन लक्ष्य

समझ नही पाया 
आज तक 
जीवन लक्ष्य 
साहित्य साक्षात
नही आया
जीवित रहने मे काम
आवश्यकता होने पर 
विलुप्त हो जाता
किताबी ज्ञान 
बदलता हैं हर पल 
नये अंदाज लिए 
विवेक गडबडा जाता
अंधेरों के घने छाये
रोकते हैं रोशनी 
बाहरी ओर भीतरी
ऐसे मे मेरे चेतन
आत्मीय रहो ओर छुओं मेरी
अंधेरे की दुनिया 
महसूस करो मुझे 
मेरा पात्र खाली घना 
स्व उत्पन्न विचारधारा 
टेढे मेढे रास्तों सी
नही चला जाता 
इस गति बढती लंबी दूरी
कैसे होगी पार 
मिलेगी मंजिल संदेह अटल
नही जीया जाता खामोशी 
ओर शब्द नही होते समर्थ 
विश्वास दे सकूँ जिन्दगी तुझे 
शब्दों से
एक गुमनाम गली बन चुकी 
जिन्दगी 
ओर सहारे सभी व्यवहारिक 
जिससे चलता रहता 
व्यवसाय जीवन का
अंत शून्य भरता जाता 
अंतहीन जिज्ञासाओं का झोला
केवल सत्य सार मिथ्या जीवन तेरा
खूब कहो पलायन वादी मुझे 
अच्छा है 
कुछ कहने लायक बनने मे
पात्रता तो हो
छगन लाल गर्ग