ढंग की जगह तो हो
सुनता आवाज मित्र की
मुस्कान की जगह
कसैला चेहरा उनका
देता उलाहना सुबह सुबह
लगाता हूँ हिसाब
समय देखकर
सत्य कहते हैं मित्र
क्या हो जवाब इसका
नहीं शब्द केवल मुस्कान
काफी मित्रता निभे
अकडे असमर्थ पैरों का
यह पड़ाव
निर्माणाधीन नीव सडक से सटी
थोड़ी बाहर बैठने लायक
मलबे घीरा एक रास्ता
उसी से पहुँचा मुडेर तक
बैठा सोचने लगा विगत
ठीक कहा मित्र ने
बैठने का स्थान
थोड़ा ढंग का हो
लगे सभ्य व्यक्ति सा
मजदूरों की तरह बैठना
अपनो की तोहिन ही तो
फिर मिसाल बनते हम
ओर शर्म महसूस करते
मित्रगण ओछी हरकत से
रास्तों मे मुडेर बैठक
भई वाह बुद्धि कुंठित हुई शायद
कितना संवारा खुद को
देह की पहचान इसी कारण
मन की दशा भी
देह करती निर्धारित
बाहर का सत्य देता पहचान
व्यक्तित्व का तोल भी
उसी अनुरूप
सर्वमान्य पहचान मात्र इतनी
कि आम का तिरस्कार करने की
क्षमता कितनी घनी पाये
ओर आज यही करता महसूस
जब सामान्य बना
जीने लगा तिरस्कार का जीना
अब नहीं कद्र संस्कृत जीवन
धन का वैभव
स्वयं संस्कृति सद्भावना सद् गुण
भीतर स्वत्व भाव अवधारणा
आदि बिना वैभव बेमानी
निश्वास भरता उठता हूँ
समर्थता चलने की
करता महसूस बढता घर की ओर।
छगन लाल गर्ग ।
सुनता आवाज मित्र की
मुस्कान की जगह
कसैला चेहरा उनका
देता उलाहना सुबह सुबह
लगाता हूँ हिसाब
समय देखकर
सत्य कहते हैं मित्र
क्या हो जवाब इसका
नहीं शब्द केवल मुस्कान
काफी मित्रता निभे
अकडे असमर्थ पैरों का
यह पड़ाव
निर्माणाधीन नीव सडक से सटी
थोड़ी बाहर बैठने लायक
मलबे घीरा एक रास्ता
उसी से पहुँचा मुडेर तक
बैठा सोचने लगा विगत
ठीक कहा मित्र ने
बैठने का स्थान
थोड़ा ढंग का हो
लगे सभ्य व्यक्ति सा
मजदूरों की तरह बैठना
अपनो की तोहिन ही तो
फिर मिसाल बनते हम
ओर शर्म महसूस करते
मित्रगण ओछी हरकत से
रास्तों मे मुडेर बैठक
भई वाह बुद्धि कुंठित हुई शायद
कितना संवारा खुद को
देह की पहचान इसी कारण
मन की दशा भी
देह करती निर्धारित
बाहर का सत्य देता पहचान
व्यक्तित्व का तोल भी
उसी अनुरूप
सर्वमान्य पहचान मात्र इतनी
कि आम का तिरस्कार करने की
क्षमता कितनी घनी पाये
ओर आज यही करता महसूस
जब सामान्य बना
जीने लगा तिरस्कार का जीना
अब नहीं कद्र संस्कृत जीवन
धन का वैभव
स्वयं संस्कृति सद्भावना सद् गुण
भीतर स्वत्व भाव अवधारणा
आदि बिना वैभव बेमानी
निश्वास भरता उठता हूँ
समर्थता चलने की
करता महसूस बढता घर की ओर।
छगन लाल गर्ग ।