ढूँढ ता हू मिला कहां
जो मिला उसे अपना कहूँ कैसे
हाथ मे आता कहां
जो मिला हवा बन अदृश्य अविरल हुआ
मृग तृष्णा बना ओर अधिक संतप्त करता मुझे
कैसे हो अपना
भरता हूँ दावा निरन्तर अपनो का
कभी कभी गर्व गरिमा लिए अकडता भी
पर पाता केवल अहं तुष्टि
कि आनन्द कहां उसमे
वह आनन्द जो निर्दोष हो
ऐसा सुख जीवन मे तंरग भरे
नमनीयता दे बहे नेह धारा निरन्तर
ढूँढता हूँ पवित्र निर्दोष नेह
मानव बनने की चाह मिटी नहीं हैं ।
छगन लाल गर्ग।
जो मिला उसे अपना कहूँ कैसे
हाथ मे आता कहां
जो मिला हवा बन अदृश्य अविरल हुआ
मृग तृष्णा बना ओर अधिक संतप्त करता मुझे
कैसे हो अपना
भरता हूँ दावा निरन्तर अपनो का
कभी कभी गर्व गरिमा लिए अकडता भी
पर पाता केवल अहं तुष्टि
कि आनन्द कहां उसमे
वह आनन्द जो निर्दोष हो
ऐसा सुख जीवन मे तंरग भरे
नमनीयता दे बहे नेह धारा निरन्तर
ढूँढता हूँ पवित्र निर्दोष नेह
मानव बनने की चाह मिटी नहीं हैं ।
छगन लाल गर्ग।