शास्त्र ओर जीवन मे फर्क हैं
जीवन के प्रश्न अब घने जटिल हैं
सिद्धांत पुनः सोच मे डालते हैं
विवेक की तुला असंतुलित हुई हैं
ओर हृदय बीच मे भ्रमित तंरग बना
कभी शास्त्र ओर कभी सत्य अनुभूति बीच
भटकता हैं जीवन भर
बिना सार पाये अर्थ हीन
अभिव्यक्ति साधन नहीं बन सकती
जीने की
शास्त्र अभिव्यक्ति साधन ही भूल हमारी
ओर यही असफल जीवन का सत्य हैं
भीतर का सत्य बड़ा कडवा हैं
हिलाने जैसा
आत्म साक्षात्कार किये बिना हम
विवेकी बन बैठे हैं
ज्ञान पिपासा अलग हैं
सत्य अलग हैं
अभिव्यक्ति मात्र छाया केवल
आत्मा की
ओर वह बिना भीतरी तलाश
बकवास हैं
बारी हम सभी की तलाश आत्म तत्व हो।
छगन लाल गर्ग।
जीवन के प्रश्न अब घने जटिल हैं
सिद्धांत पुनः सोच मे डालते हैं
विवेक की तुला असंतुलित हुई हैं
ओर हृदय बीच मे भ्रमित तंरग बना
कभी शास्त्र ओर कभी सत्य अनुभूति बीच
भटकता हैं जीवन भर
बिना सार पाये अर्थ हीन
अभिव्यक्ति साधन नहीं बन सकती
जीने की
शास्त्र अभिव्यक्ति साधन ही भूल हमारी
ओर यही असफल जीवन का सत्य हैं
भीतर का सत्य बड़ा कडवा हैं
हिलाने जैसा
आत्म साक्षात्कार किये बिना हम
विवेकी बन बैठे हैं
ज्ञान पिपासा अलग हैं
सत्य अलग हैं
अभिव्यक्ति मात्र छाया केवल
आत्मा की
ओर वह बिना भीतरी तलाश
बकवास हैं
बारी हम सभी की तलाश आत्म तत्व हो।
छगन लाल गर्ग।