Saturday, June 11, 2016

शास्त्र ओर जीवन

शास्त्र ओर जीवन मे फर्क हैं 
जीवन के प्रश्न अब घने जटिल हैं 
सिद्धांत पुनः सोच मे डालते हैं 
विवेक की तुला असंतुलित हुई हैं 
ओर हृदय बीच मे भ्रमित तंरग बना 
कभी शास्त्र ओर कभी सत्य अनुभूति बीच
भटकता हैं जीवन भर
बिना सार पाये अर्थ हीन
अभिव्यक्ति साधन नहीं बन सकती
जीने की 
शास्त्र अभिव्यक्ति साधन ही भूल हमारी
ओर यही असफल जीवन का सत्य हैं 
भीतर का सत्य बड़ा कडवा हैं 
हिलाने जैसा
आत्म साक्षात्कार किये बिना हम
विवेकी बन बैठे हैं 
ज्ञान पिपासा अलग हैं 
सत्य अलग हैं 
अभिव्यक्ति मात्र छाया केवल 
आत्मा की 
ओर वह बिना भीतरी तलाश 
बकवास हैं 
बारी हम सभी की तलाश आत्म तत्व हो।
छगन लाल गर्ग।