आओ आज कर ले बात जी भर।
मन की खोले गाँठ आज जी भर।
पल का फेर बदले मन फिर सार।
आओ आज कर ले बात जी भर।।
हम कहे पहले मन दो हम पर।
जल से कोमल रहे जीवन भर।
नेह बंधन अविरल जकडे पर।
देह संताप त्रस्त हैं जीवन भर।
सुख आया गया खेले जी भर।
तृष्णा खेल अटूट झेले जी भर।
प्यास वहीं वहीं झैले जी भर ।
सन्तुष्ट जीवन हुआ न पल भर।
प्याला रस छलक छलक कर।
भीगे तन मन फिर बहा नीर।
पीर बसायी प्राण रस मगर।
रस गागर बही न हृदय धार।
भटकन ही हृदय विवर बयार।
हे मित्र मैं मात्र बाधित हूँ धार ।।
छगन लाल गर्ग।
मन की खोले गाँठ आज जी भर।
पल का फेर बदले मन फिर सार।
आओ आज कर ले बात जी भर।।
हम कहे पहले मन दो हम पर।
जल से कोमल रहे जीवन भर।
नेह बंधन अविरल जकडे पर।
देह संताप त्रस्त हैं जीवन भर।
सुख आया गया खेले जी भर।
तृष्णा खेल अटूट झेले जी भर।
प्यास वहीं वहीं झैले जी भर ।
सन्तुष्ट जीवन हुआ न पल भर।
प्याला रस छलक छलक कर।
भीगे तन मन फिर बहा नीर।
पीर बसायी प्राण रस मगर।
रस गागर बही न हृदय धार।
भटकन ही हृदय विवर बयार।
हे मित्र मैं मात्र बाधित हूँ धार ।।
छगन लाल गर्ग।