Saturday, June 11, 2016

जहरीली घूटन

दागित हुआ जाता जीता भी हूँ 
बेदाग जिन्दगी अब अतीत हो रही
अब जीना केवल 
जीजीविषा हैं जिन्दगी कैसे कहूँ 
अख्तियार करना पडा
यह बेढंगा भी जीवन 
विवशता जीता हूँ 
समस्त श्वास आती जाती
पूछती जाती हैं 
जिन्दगी जीने का कारण
अनभिज्ञ हूँ मैं 
बेजुबान होता हूँ जुबान होते भी
संचय का वर्तमान अतीत 
भविष्य शब्द बेअर्थ हैं शब्द बना
अपनत्व बिना का जीवन 
अकारण जीता हूँ 
भीतरी भावों का प्रकाश 
वर्तमान की घनी कालिमा तले
दागित हुआ 
दबाव मे लेता जाता
शिथिल शिथिल श्वासे
फैलता जाता हैं 
निकलती श्वासो का जहरीला धुऑ
खिंचता जाता वहीं जहरीला धुऑ
जिन्दा रहने की चेष्टा मे
भीतर के दाग बढ़ाता 
जीता हूँ 
यह जहरीली घूटन भरी
जिन्दगी मेरी 
पावन श्वासे छोडता जीता हूँ 
जिन्दगी तुझे 
यह जहरीलापन का धुऑ
गंदी बस्तियों से नहीं उठा
है स्मार्ट हुए नगरों का
जहाँ जहर घूला हैं वातावरण मे
कि सभ्यता के परमाणु 
पहुँचे हैं गाँव मेरे 
नौजवानो की श्वासो को स्पर्श किए
बहते हैं 
लेनी होती श्वासे जिन्दगी के लिए
सभ्य जीने के लिए
पनपते जाते हैं नित जहरीले कीड़े 
अनंत वासना के
बनाते जाते हैं तन मन मे मवाद
ओर रिसता जाता हैं 
तृष्णा का मवाद
कुलबुलाते जाते हैं वासना के कीड़े 
रोकनी होगी इस अति सभ्य दूषित हवा को
पहचान पानी होगी अपनी अस्मिता भरी
अतीत की हवा 
तभी दाग रूकेगे मानवता के
अन्यथा तो
केवल मैं ही क्यों 
हम सभी बाधित होंगे 
जहरीली श्वास भरने को
ओर भीतर के दाग घने होंगे 
हकदार होंगे कैसे 
कि मानव कहलाये।
छगन लाल गर्ग।