दागित हुआ जाता जीता भी हूँ
बेदाग जिन्दगी अब अतीत हो रही
अब जीना केवल
जीजीविषा हैं जिन्दगी कैसे कहूँ
अख्तियार करना पडा
यह बेढंगा भी जीवन
विवशता जीता हूँ
समस्त श्वास आती जाती
पूछती जाती हैं
जिन्दगी जीने का कारण
अनभिज्ञ हूँ मैं
बेजुबान होता हूँ जुबान होते भी
संचय का न वर्तमान न अतीत
भविष्य शब्द बेअर्थ हैं शब्द बना
अपनत्व बिना का जीवन
अकारण जीता हूँ
भीतरी भावों का प्रकाश
वर्तमान की घनी कालिमा तले
दागित हुआ
दबाव मे लेता जाता
शिथिल शिथिल श्वासे
फैलता जाता हैं
निकलती श्वासो का जहरीला धुऑ
खिंचता जाता वहीं जहरीला धुऑ
जिन्दा रहने की चेष्टा मे
भीतर के दाग बढ़ाता
जीता हूँ
यह जहरीली घूटन भरी
जिन्दगी मेरी
पावन श्वासे छोडता जीता हूँ
जिन्दगी तुझे
यह जहरीलापन का धुऑ
गंदी बस्तियों से नहीं उठा
है स्मार्ट हुए नगरों का
जहाँ जहर घूला हैं वातावरण मे
कि सभ्यता के परमाणु
पहुँचे हैं गाँव मेरे
नौजवानो की श्वासो को स्पर्श किए
बहते हैं
लेनी होती श्वासे जिन्दगी के लिए
सभ्य जीने के लिए
पनपते जाते हैं नित जहरीले कीड़े
अनंत वासना के
बनाते जाते हैं तन मन मे मवाद
ओर रिसता जाता हैं
तृष्णा का मवाद
कुलबुलाते जाते हैं वासना के कीड़े
रोकनी होगी इस अति सभ्य दूषित हवा को
पहचान पानी होगी अपनी अस्मिता भरी
अतीत की हवा
तभी दाग रूकेगे मानवता के
अन्यथा तो
केवल मैं ही क्यों
हम सभी बाधित होंगे
जहरीली श्वास भरने को
ओर भीतर के दाग घने होंगे
हकदार होंगे कैसे
कि मानव कहलाये।
छगन लाल गर्ग।
बेदाग जिन्दगी अब अतीत हो रही
अब जीना केवल
जीजीविषा हैं जिन्दगी कैसे कहूँ
अख्तियार करना पडा
यह बेढंगा भी जीवन
विवशता जीता हूँ
समस्त श्वास आती जाती
पूछती जाती हैं
जिन्दगी जीने का कारण
अनभिज्ञ हूँ मैं
बेजुबान होता हूँ जुबान होते भी
संचय का न वर्तमान न अतीत
भविष्य शब्द बेअर्थ हैं शब्द बना
अपनत्व बिना का जीवन
अकारण जीता हूँ
भीतरी भावों का प्रकाश
वर्तमान की घनी कालिमा तले
दागित हुआ
दबाव मे लेता जाता
शिथिल शिथिल श्वासे
फैलता जाता हैं
निकलती श्वासो का जहरीला धुऑ
खिंचता जाता वहीं जहरीला धुऑ
जिन्दा रहने की चेष्टा मे
भीतर के दाग बढ़ाता
जीता हूँ
यह जहरीली घूटन भरी
जिन्दगी मेरी
पावन श्वासे छोडता जीता हूँ
जिन्दगी तुझे
यह जहरीलापन का धुऑ
गंदी बस्तियों से नहीं उठा
है स्मार्ट हुए नगरों का
जहाँ जहर घूला हैं वातावरण मे
कि सभ्यता के परमाणु
पहुँचे हैं गाँव मेरे
नौजवानो की श्वासो को स्पर्श किए
बहते हैं
लेनी होती श्वासे जिन्दगी के लिए
सभ्य जीने के लिए
पनपते जाते हैं नित जहरीले कीड़े
अनंत वासना के
बनाते जाते हैं तन मन मे मवाद
ओर रिसता जाता हैं
तृष्णा का मवाद
कुलबुलाते जाते हैं वासना के कीड़े
रोकनी होगी इस अति सभ्य दूषित हवा को
पहचान पानी होगी अपनी अस्मिता भरी
अतीत की हवा
तभी दाग रूकेगे मानवता के
अन्यथा तो
केवल मैं ही क्यों
हम सभी बाधित होंगे
जहरीली श्वास भरने को
ओर भीतर के दाग घने होंगे
हकदार होंगे कैसे
कि मानव कहलाये।
छगन लाल गर्ग।