Monday, June 13, 2016

घीरा भंवर

ले चल मुझे अब 
घीरा भंवर 
जिन्दगी की लहरो बीच 
बहुत लड लिया 
सामर्थ्य सीमा के बाहर
लडखडाया जीता हूँ 
कहता हूँ 
देखते हो तुम 
कि अभी हैं 
ओर घुटता जाता
रात दिन 
फिर भी जीता जाता 
अजीब हैं 
लडको ने त्यागा इसे
पत्नी साथ कहां रही
अजीब जीवट
जीता 
पेट भरा कि खाली
कौन कहे 
क्यों कहे
व्यस्त जिन्दगी के
क्या अपने ओर काम छोडे
प्रपंच इसकी फसे
अजीब हूँ मैं 
कि ऐसे मे जीये जाता हूँ 
धिक्कारी जिन्दगी मेरी
पीड़ा कोष बढ़ा 
उफान हैं अब
लहरे भावो की
अनझेली परायी सी
परायापन दिखाओ
छिटको मुझे 
फैको  
कि मौत जाये
अन्यथा मैं 
जीजिविषा का दोषी बना
लोगो की नजरो मे
खटकता रहूँगा 
प्रभु मेरे 
अगर तू हैं कहीं तो
ले चल अब मुझे
छगनलाल गर्ग।