ले चल मुझे
अब
घीरा भंवर
जिन्दगी की लहरो बीच
बहुत लड लिया
सामर्थ्य सीमा के बाहर
लडखडाया जीता हूँ
कहता हूँ
देखते हो तुम
कि अभी हैं
ओर घुटता जाता
रात दिन
फिर भी जीता जाता
अजीब हैं
लडको ने त्यागा इसे
पत्नी साथ कहां रही
अजीब जीवट
जीता
पेट भरा कि खाली
कौन कहे
क्यों कहे
व्यस्त जिन्दगी के
क्या अपने ओर काम छोडे
प्रपंच इसकी फसे
अजीब हूँ मैं
कि ऐसे मे जीये जाता हूँ
धिक्कारी जिन्दगी मेरी
पीड़ा कोष बढ़ा
उफान हैं अब
लहरे भावो की
अनझेली परायी सी
परायापन दिखाओ
छिटको मुझे
फैको न
कि मौत आ जाये
अन्यथा मैं
जीजिविषा का दोषी बना
लोगो की नजरो मे
खटकता रहूँगा
प्रभु मेरे
अगर तू हैं कहीं तो
ले चल अब मुझे ।
छगनलाल गर्ग।
घीरा भंवर
जिन्दगी की लहरो बीच
बहुत लड लिया
सामर्थ्य सीमा के बाहर
लडखडाया जीता हूँ
कहता हूँ
देखते हो तुम
कि अभी हैं
ओर घुटता जाता
रात दिन
फिर भी जीता जाता
अजीब हैं
लडको ने त्यागा इसे
पत्नी साथ कहां रही
अजीब जीवट
जीता
पेट भरा कि खाली
कौन कहे
क्यों कहे
व्यस्त जिन्दगी के
क्या अपने ओर काम छोडे
प्रपंच इसकी फसे
अजीब हूँ मैं
कि ऐसे मे जीये जाता हूँ
धिक्कारी जिन्दगी मेरी
पीड़ा कोष बढ़ा
उफान हैं अब
लहरे भावो की
अनझेली परायी सी
परायापन दिखाओ
छिटको मुझे
फैको न
कि मौत आ जाये
अन्यथा मैं
जीजिविषा का दोषी बना
लोगो की नजरो मे
खटकता रहूँगा
प्रभु मेरे
अगर तू हैं कहीं तो
ले चल अब मुझे ।
छगनलाल गर्ग।