Thursday, June 9, 2016

पुस्तकें

अब नहीं पढता
विशद ज्ञान उकेरती पुस्तकें 
गहनता की कुण्डली बीच
चक्कराने लगता मस्तिष्क 
उठापटक विचारों का
नहीं आता काम
विशप्त दशा घेरने लगती 
जब पहुँचने लगता 
जीवन के सत्य 
करता हूँ हिस्से भावों के
विश्रृखलित विचार बीज
लेते हैं आकार
सामान्य जन विशिष्ट दरम्यान
सत्य सार यही 
मानवता नहीं 
शैली की सत्यता 
विभेद के आचरण 
समझाते जाते शास्त्र
युगों के मानव भाव 
कूचलते श्रेष्ठता पाये विचार 
कैसे मानें सत्य 
झाकने लगा मौन मूक
चेहरों को
करता जाता प्रयास 
उन्हें पढ़ने का
असली शास्त्र
पढने लायक पुस्तकें 
ईश्वर प्रदत
यही हैं


उल़झन रहते 
नहीं पाता
विचारों की शास्वतता
घनीभूत हुई श्रृंखला
कहती जाती 
अपनी प्रमाणिकता
हर तथ्य चाहता अस्तित्व
जबकि रहते प्रतिकूल
ओर बिना सार पाये
घीरता जाता 
घनी उलझन बीच
कहां हैं तारतम्य
जीवन ओर विचारों का
जैसे ही पहचान पाता
किसी विषय सत्यता
तर्कों का जाल
नकारता देता 
अपना तर्क
नहीं जीवन 
बन गया गुंफन
उलझे धागों सा
सुलझाने में 
उलझन बढती
निर्पेक्षता नहीं 
अब अनुभव कहता
गहरी चिंतन प्रक्रिया
विद्वानों की शिक्षा
बनाती जीवन जटिल
स्वत स्फूरण 
मौलिक अनुभूति 
होती जाती कुंठित
नही अच्छा
परोसा हुआ
कि पाया जा सके
सार जीवन 
उतरना होगा स्वयं 
के रोशनी भरे
आकाश।