यह कारवाँ
बहुत अनजान
चल दिया अनजानी राह
कंकर पत्थर भरी हैं राहे
हर कोई बनाता अपनी राह
संगी चलते साथ हैं मेरे
साथी मिलते नहीं सहायक
समतल का स्वभाव लिए अब
चलना हुआ हैं नामुमकिन
राह गिरी गृह्वर घनेरे
शिथिल कदमों ने छोड़ा साथ
अजीब दुविधा पाया रे जीवन
आगे बढ़ने मे घने अवरोध
चंचल संगी देखे पीछे
छूटा बिछडा घना अंतराल
बैठा हूँ गिरी की तलहटी
छाया घेरती हैं अविराम
मंद पवन के झौके रह रह
देते जाते अब नया संदेश
अपने बल ही चढ़ सकोगे
ऊँचे ख्वाब धरातल सम हो
पार जीवन नहीं कोई पाया
चढ़े चढ़ाई नीचे आना
यही हैं जीवन सार समझ मन
समतल देता हैं संतुलन
ज्ञान क्रिया श्रृद्धा का समरूप
लेकर जीवन आगे बढ़ता
दृश्य चढ़ाई भाति मन को
असंतुलन बढाये जीवन उलझा
रे मन सुन अब जी ले थोड़ा
पीयूष स्त्रोत बन जीवन तेरा
मादक रस का बहता निर्झर
स्नेह धारा मे तन मन नहा ले ।
छगन लाल गर्ग।
बहुत अनजान
चल दिया अनजानी राह
कंकर पत्थर भरी हैं राहे
हर कोई बनाता अपनी राह
संगी चलते साथ हैं मेरे
साथी मिलते नहीं सहायक
समतल का स्वभाव लिए अब
चलना हुआ हैं नामुमकिन
राह गिरी गृह्वर घनेरे
शिथिल कदमों ने छोड़ा साथ
अजीब दुविधा पाया रे जीवन
आगे बढ़ने मे घने अवरोध
चंचल संगी देखे पीछे
छूटा बिछडा घना अंतराल
बैठा हूँ गिरी की तलहटी
छाया घेरती हैं अविराम
मंद पवन के झौके रह रह
देते जाते अब नया संदेश
अपने बल ही चढ़ सकोगे
ऊँचे ख्वाब धरातल सम हो
पार जीवन नहीं कोई पाया
चढ़े चढ़ाई नीचे आना
यही हैं जीवन सार समझ मन
समतल देता हैं संतुलन
ज्ञान क्रिया श्रृद्धा का समरूप
लेकर जीवन आगे बढ़ता
दृश्य चढ़ाई भाति मन को
असंतुलन बढाये जीवन उलझा
रे मन सुन अब जी ले थोड़ा
पीयूष स्त्रोत बन जीवन तेरा
मादक रस का बहता निर्झर
स्नेह धारा मे तन मन नहा ले ।
छगन लाल गर्ग।