अजीब हैं मन की दशा
तिरस्कृत अस्तित्व पश्चात भी
चाहने लगता
रिस्तो का गहरापन
बड़ी दयनीय दशा दिल की
जो अबोध रहा
दुनियादारी का पाठ
जो मतलब से प्रारंभ होता
ऑखो वालो को दिखाई देता
साफ सुथरापन लिऐ
सारवान मतलबी
जिसे शब्द मिलते व्यवहारिक
जायज व नीति युक्त
जबकि भीतर छाया रहता
मतलब का धुऑ
जो सुलगता रहता
अस्तित्व समाप्ति तक
यहाँ रिस्ते केवल
उठते जीवन के साथी बनते
खुद के बराबरी तक
गिरते जीवन को नहीं मिलता साथ
अपनो या गेरो का
संवेदना का भी होता हैं
एक गणित
जिसमें जीवन के मतलबी भाव
तुलते हैं तराजू
ओर यदि निगाह न हो
तोल पर
अस्तित्व भी तोल देते तुम्हारा
ओर फिर यही दशा
कि होते रहो तिरस्कृत उनसे ही
जो तुम्हारे रस से
हुए आज हैं फलीभूत
इस अजीबोगरीब दुनियादारी से
अच्छा हैं
सामान्य जीवन का विरक्त भाव
जहाँ आशा अभिलाषा होती
केवल अपने पर
अपनी क्षमता पर
ओर पावन परमात्मा पर
शायद यही हैं असली रिस्ता
जहाँ मिलता केवल निश्छल विश्वास ।
छगन लाल गर्ग।
तिरस्कृत अस्तित्व पश्चात भी
चाहने लगता
रिस्तो का गहरापन
बड़ी दयनीय दशा दिल की
जो अबोध रहा
दुनियादारी का पाठ
जो मतलब से प्रारंभ होता
ऑखो वालो को दिखाई देता
साफ सुथरापन लिऐ
सारवान मतलबी
जिसे शब्द मिलते व्यवहारिक
जायज व नीति युक्त
जबकि भीतर छाया रहता
मतलब का धुऑ
जो सुलगता रहता
अस्तित्व समाप्ति तक
यहाँ रिस्ते केवल
उठते जीवन के साथी बनते
खुद के बराबरी तक
गिरते जीवन को नहीं मिलता साथ
अपनो या गेरो का
संवेदना का भी होता हैं
एक गणित
जिसमें जीवन के मतलबी भाव
तुलते हैं तराजू
ओर यदि निगाह न हो
तोल पर
अस्तित्व भी तोल देते तुम्हारा
ओर फिर यही दशा
कि होते रहो तिरस्कृत उनसे ही
जो तुम्हारे रस से
हुए आज हैं फलीभूत
इस अजीबोगरीब दुनियादारी से
अच्छा हैं
सामान्य जीवन का विरक्त भाव
जहाँ आशा अभिलाषा होती
केवल अपने पर
अपनी क्षमता पर
ओर पावन परमात्मा पर
शायद यही हैं असली रिस्ता
जहाँ मिलता केवल निश्छल विश्वास ।
छगन लाल गर्ग।