Friday, June 3, 2016

रिश्ते

नही आंके जा सकते
रिश्ते 
सेवा की बदौलत 
आधार आत्मीय रस युक्त
ओर यही कारण कि
असमर्थता नही बनती अडचन
अंतिम क्षमता का समर्पण 
निभाते जीते रिश्ते 
पर वक्त के पैने पंजे अब
जकड चूके विचारधारा 
हर रिश्ता बन रहा आज 
जरूरत का साधन 
वात्सल्य सूर का 
केवल कल्पित पद 
अनदेखी की 
करते रहो व्याख्या 
रसमय सूक्ष्म भावों से
क्या फायदा 
जीवन जटिलता के दौर से 
गुजर रहा
हमारी अर्थ व्यवस्था की तरह
बिना जख्म पर चौट किये 
नष्ट होगा कैसे 
ओर यही सब हमारे
अति नाजुक रिश्तों का सच
कि गरज से चलते परिवार 
फर्ज वही निभाते
जहां मलाई की परत जमे
अन्यथा 
दूध रक्त के रिश्ते 
अब मांगते बलिदान 
समय की 
साक्षेप मांग भी यही 
करे हर कोई सदस्य 
अपने अधिकार की मांग 
खटकटाये न्याय के कपाट
सामर्थ्य का सच 
रिश्तों से अधिक असलियत 
उभरता जाता 
आज प्रगतिशील परिवर्तन युग 
अब सजग रहो 
कर लो स्वागत 
नये युग के अच्छे दिन 
आना चाहते 
हर जरूरतमंद की जिंदगी
मौलिक सत्य यही 
स्वीकार करो मेरी तरह 
बेसहारा मित्रों 
अच्छा हैं समर्पित होकर जीना भी।
छगन लाल गर्ग