जानने लगा हूँ मैं
अकथ सत्य
तुम्हारी शैय्या ऊँची घनी
हमसे
अहंकार ईश्वरीय
सामान्य नही कि चुनौती पर
तुला योग्य हो
वर्ण व्यवस्था शास्त्रीय नही
स्वयं ईश्वर करते नमन
ब्राह्मणत्व पाया तुमने
खरा उतरा
व्यवहार ओर व्यवस्था में
पर भीतर तुम
डरते घने हो
अपने आप से
योग्यता की कसौटी कोई ओर नही
तुम्हारा आत्मप्रकाश ही
करता जाता
ओर प्राण तुम्हारे
अतृप्ति से
अति सूक्ष्म ब्रह्म तत्व से अनभिज्ञ
तुम्हें पहचानने भूल चुके
लौटो तो
असलियत मे
पावन दाग हुए बिना
ब्राह्मण की छाप
तुम्हारी सबसे बडी
त्रासदी बनी
मानवता के लिए
समझना तो पडेगा
समय रहते ।
छगनलाल गर्ग ।
अकथ सत्य
तुम्हारी शैय्या ऊँची घनी
हमसे
अहंकार ईश्वरीय
सामान्य नही कि चुनौती पर
तुला योग्य हो
वर्ण व्यवस्था शास्त्रीय नही
स्वयं ईश्वर करते नमन
ब्राह्मणत्व पाया तुमने
खरा उतरा
व्यवहार ओर व्यवस्था में
पर भीतर तुम
डरते घने हो
अपने आप से
योग्यता की कसौटी कोई ओर नही
तुम्हारा आत्मप्रकाश ही
करता जाता
ओर प्राण तुम्हारे
अतृप्ति से
अति सूक्ष्म ब्रह्म तत्व से अनभिज्ञ
तुम्हें पहचानने भूल चुके
लौटो तो
असलियत मे
पावन दाग हुए बिना
ब्राह्मण की छाप
तुम्हारी सबसे बडी
त्रासदी बनी
मानवता के लिए
समझना तो पडेगा
समय रहते ।
छगनलाल गर्ग ।