Monday, June 13, 2016

अकथ सत्य

जानने लगा हूँ मैं
अकथ सत्य 
तुम्हारी शैय्या ऊँची घनी
हमसे 
अहंकार ईश्वरीय 
सामान्य नही कि चुनौती पर
तुला योग्य हो
वर्ण व्यवस्था शास्त्रीय नही 
स्वयं ईश्वर करते नमन
ब्राह्मणत्व पाया तुमने 
खरा उतरा 
व्यवहार ओर व्यवस्था में
पर भीतर तुम 
डरते घने हो
अपने आप से
योग्यता की कसौटी कोई ओर नही 
तुम्हारा आत्मप्रकाश ही
करता जाता
ओर प्राण तुम्हारे 
अतृप्ति से
अति सूक्ष्म ब्रह्म तत्व से अनभिज्ञ 
तुम्हें पहचानने भूल चुके 
लौटो तो
असलियत मे
पावन दाग हुए बिना 
ब्राह्मण की छाप 
तुम्हारी सबसे बडी 
त्रासदी बनी 
मानवता के लिए
समझना तो पडेगा 
समय रहते
छगनलाल गर्ग