मैं राग प्राणों का
निश्छल गाने दो ।
विषम विरह दीप
नेह राग जलने दो ।
रश्मि बन रोम रहता
प्रवाह विरल बहने दो ।
झूलता हूँ स्वर बनता
लता से झौके खाने दो ।
राग विराग विलय मुझमें
महा प्रयाण अब होने दो।।
छगन लाल गर्ग।
निश्छल गाने दो ।
विषम विरह दीप
नेह राग जलने दो ।
रश्मि बन रोम रहता
प्रवाह विरल बहने दो ।
झूलता हूँ स्वर बनता
लता से झौके खाने दो ।
राग विराग विलय मुझमें
महा प्रयाण अब होने दो।।
छगन लाल गर्ग।