Sunday, June 12, 2016

आवाज उभरी

आवाज उभरी हैं अन्तर की चेतना
भटकते प्रश्न पालती हैं 
जो निरूतर भटकते घने विवर
हर चित टकराये ओर जख्मी हुए हैं 
सार हीन धूमिल अंधेरो की परत परत मे दबे थके
चेतना थकी पर मिटी कहां
रह रह उभरते विकल करते
यह देह ओर चेतन प्राण का दिखता बिम्ब
चलायमान गति मान भरता फूलता अस्तित्व व्यक्तित्व
कि मैं हूँ एक दृढ़ता कि मेरा हैं
यह तन यह मन यह जीवन सब मुझमे अन्तर्लीन
होता हुआ जीता हूँ मैं
यह जीना मेरा तब भार बनता
जब प्रश्न उठता वहीं
जो हैं अभी निरूतर असीम हुआ सा
कि मेरा सब कुछ कहना मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व सहित
क्या कभी रहा मेरा मेरी सामर्थ्य तले जीना
रहा हैं रहेगा
प्रश्न जटिल नही पर विवेक हमारा बहुत जटिल
चाह का अतिरंजन सुख जोहता यह जीवन
जानता बूझता पर मानता कहां
घनेरे जज्बातो बीच दब दब जाता सत्य
अंधेरे के घने विवर मे फिर फिर भटकने को आतुर
यह मन यह देह ओर अनगिनत सपनो का
अंतहीन रंगीन जज्बा
क्या हो इसका प्रश्न केवल यही यही
जो हैं अनुतरित
जिसका उतर जानते भी
देना नहीं चाहते हम
विवशता हमारी।
छगन लाल गर्ग।