अब नहीं रही
शब्दों मे बिसात
कि शब्द दे सके
भावों को अर्थ
धुंधले होते
नित्य जिंदगी की तरह
और हम
बदलती जिंदगी का
नहीं जान पाये अर्थ
कि पा सके साम्यता
हर बनावट चाहती
सार्थक शब्द
बिना सार्थक हुए खुद
औढती जाती
शब्दों की चादर
अंग ढकती
पौशाक की तरह
पर कृत्रिम आवरण
उघडता जाता
बेअर्थ जीते शब्दों से
नहीं ढक पाता
कृत्रिम चेहरा
ओर होता रहता हूँ
बैचेन
कोई शब्द है जो कह सके
दोगली जीती
मेरी जिंदगी की
सभ्य कहानी।
छगन लाल गर्ग।
शब्दों मे बिसात
कि शब्द दे सके
भावों को अर्थ
धुंधले होते
नित्य जिंदगी की तरह
और हम
बदलती जिंदगी का
नहीं जान पाये अर्थ
कि पा सके साम्यता
हर बनावट चाहती
सार्थक शब्द
बिना सार्थक हुए खुद
औढती जाती
शब्दों की चादर
अंग ढकती
पौशाक की तरह
पर कृत्रिम आवरण
उघडता जाता
बेअर्थ जीते शब्दों से
नहीं ढक पाता
कृत्रिम चेहरा
ओर होता रहता हूँ
बैचेन
कोई शब्द है जो कह सके
दोगली जीती
मेरी जिंदगी की
सभ्य कहानी।
छगन लाल गर्ग।