Saturday, June 11, 2016

मन करता हैं

मन करता हैं 
अन्तराल बीच कटता जीवन 
कभी कभी विगत भटकता हैं 
ओर चाहता अपनों की छाँव 
जहां जीवन खेला था नित नयी अठखेलिया
अपनों के साथ घनी आत्मीयता लिए
स्वार्थ का बंवडर अंधी बाढ़ लिए 
निश्छल स्नेह सरिता को गंदला कर बहा 
भयानक विध्वंस लिए
कठोर निर्मम चित अडे रहे विध्वंस बीच 
नदी के द्वीप की तरह
बने रहे अडिग बहते देखते गर्व भरे 
कोमल गात वृक्षों कच्ची दीवारों बने घरों को बहते
आनन्द प्रभुता के मद इतराये से
जो कि कभी उनके रहे हिमायती आधार
वर्चस्व मोह सम्पत्ति एकाधिकार स्वार्थ मे
खुद धक्का देते 
धकेला दोनों हाथों 
बहती विनाश धारा मे
उस विध्वंस धार का बचा अवशेष हूँ मैं 
जिसने पड़ाव पा बनाया नया नीड आशा का
विश्वास संग श्रृद्धा का नेह निर्माण का 
संचित स्नेह अब गहराया हैं 
ओर चाहने लगा हैं बार बार
दुखद विगत पलो की वापसी 
जहां संबंधो की ज्वाला स्वार्थ अग्नि जली 
रक्त संबंध तार तार हो बिखरे बहे जले
समय की परते लाख ढके 
उभर उभर टीस कसक देते
फिर भी
यह मन भटकता हैं 
पाना चाहता फिर फिर अपनों की छाँव
छगन लाल गर्ग।