Friday, June 3, 2016

यह जीवन

निर्धारित मापदंड 
यांत्रिक कर देता जीवन 
नव सृजन क्षण होते दमित
मूल्यों की बेडियाँ 
बाँधे रखती मनुष्य का स्पंदन
अधिकांश बार
मूल्यों के भय छूट जाते
मानवीय संवेदना कर्म 
नहीं होती हिम्मत रीतियों विरुद्ध 
सत्य पावन ओर सहृदय जीना
मानव बन संवेदनशील पल
ओर सभ्यता देती चमक
बनावटी बेअर्थ वैभव धुन 
जिसमें पीसती जाती
मानवता
ओर छल साम्राज्य हुआ जाता
आच्छादित नैतिक मूल्यों पर
नहीं मिलती झलक
कि व्यथित अहसास हो कहीं 
वात्सल्य स्नेह 
या औलाद कर्तव्य बोध
धंसता जा रहा युग स्वार्थ के अज्ञात कुएँ 
क्या कहूँ 
घनी उद्र भ्रांत दशा भटकन मात्र 
यह जीवन 
स्वार्थ पूर्ति प्रयास ले डूबता नित्य 
अनीति कदाचार ओर शोषण के ताल
उधर मापदंडों की स्वीकृति
मूक मन मिलती रहती 
ओर युग प्रगति का यह नया आयाम 
होता जाता यांत्रिक मानव
आत्माहीन संवेदना शून्य 
बौद्धिकता की सीढ़ी से उठना होगा 
थोड़ा ऊपर 
करो ना पकड ढीली 
बढ़ो आगे मानवता की ऊँची सीढ़ी 
वहीं ले जाती दिव्यता की मंजिल 
अन्यथा 
जीवन पाये भी अनपाया सा 
बिना मानव मर्म पाये।
पशुवत ही काल खींचता निरंतर
छगन लाल गर्ग।