माटी की पहचान
आंखे नहीं दिल जानता
फर्क हैं
दोनों का
पहचान की नीजता
अपनी अपनी
दिल का जुडाव रमना चाहता
उन घरोदो के साथ
जिन्हें इन्ही हाथों ने
बनाये थे हर बार
भीतर सिहर उठता
जब बिखर जाते
नन्हें पैरो का बार बार
भीगी मिट्टी को अपने ऊपर थेपना
निराशा नहीं
उमंग देता नव निर्माण की
खेल ओर सृजन का यह विलय
दिल जुडी माटी का
आत्मलीन हुआ पल
पहचान देता एकरसता की
ओर आंखे
उसी मिट्टी की कीमत
आंकती है आज
बंटवारे की कीमत
कि हटो तुम
लो मनचाही कीमत
रक्त संबधो का मापदंड
अब रिस्तों की नीव नहीं
मतलब का मर्म हुआ जाता
नयी दीवारे अधिक पक्की माटी से
घरोदो को मिटाती
साथ ही आत्मलीन एकरसता भी
जीवन के दर्द अब
पक्की दीवारो ने
अपने अपने बंटवारे
मे पृथक कर दिये
न आत्मीयता माटी की रही
न ही रिस्तो की
सभ्यता मुंह चिढाती
व्यापक विस्तार
अपने मापदंड चाहती हैं।
छगन लाल गर्ग।
आंखे नहीं दिल जानता
फर्क हैं
दोनों का
पहचान की नीजता
अपनी अपनी
दिल का जुडाव रमना चाहता
उन घरोदो के साथ
जिन्हें इन्ही हाथों ने
बनाये थे हर बार
भीतर सिहर उठता
जब बिखर जाते
नन्हें पैरो का बार बार
भीगी मिट्टी को अपने ऊपर थेपना
निराशा नहीं
उमंग देता नव निर्माण की
खेल ओर सृजन का यह विलय
दिल जुडी माटी का
आत्मलीन हुआ पल
पहचान देता एकरसता की
ओर आंखे
उसी मिट्टी की कीमत
आंकती है आज
बंटवारे की कीमत
कि हटो तुम
लो मनचाही कीमत
रक्त संबधो का मापदंड
अब रिस्तों की नीव नहीं
मतलब का मर्म हुआ जाता
नयी दीवारे अधिक पक्की माटी से
घरोदो को मिटाती
साथ ही आत्मलीन एकरसता भी
जीवन के दर्द अब
पक्की दीवारो ने
अपने अपने बंटवारे
मे पृथक कर दिये
न आत्मीयता माटी की रही
न ही रिस्तो की
सभ्यता मुंह चिढाती
व्यापक विस्तार
अपने मापदंड चाहती हैं।
छगन लाल गर्ग।