सरकारी नोकरी
एक दिवास्वप्न
हर युवा की धडकन का
उसकी योग्यता का मापदंड
जहां कसता निखारना होता
अपना व्यक्तित्व
एक अंतहीन प्रतिस्पर्धा
नोकरी मिलने तक
युवाओं का यौवन कुचलती
समय की हर करवट
प्रयासों की असफलता देती जाती
कुंठाऔ भरी जिन्दगी
कि असमय ही मरता रहता
तन भी ओर मन भी
गीता के श्लोक हो जाते सारहीन
ओर भटकाव हो जाता सारवान
कि उपेक्षा की आग
धधक ज्वाला बनती
जिसके तपन की लौ
घनी हो चुकी प्रबल
सरकारों का आश्वासन
केवल चुनावी घोषणा
बडा भटकाव हैं यह
युग का सच
यही से जन्म पाता
विषमता का बीज
असंख्य युवाओ का भविष्य
शिक्षा प्रणाली
ओर हमारे शिक्षा विद
अंधेरे की गर्त
धकलते जाते
अनचाहे भी ओर चाहे भी
बचाने को अपना अस्तित्व
कि काबिज रह सके
अपना वर्चस्व
और समृद्धता
वर्गवाद के अंत का बिगुल
युवाओं को बजाना होगा
हताशा जीवन नहीं
मृत्यु ही हैं।
छगन लाल गर्ग।
एक दिवास्वप्न
हर युवा की धडकन का
उसकी योग्यता का मापदंड
जहां कसता निखारना होता
अपना व्यक्तित्व
एक अंतहीन प्रतिस्पर्धा
नोकरी मिलने तक
युवाओं का यौवन कुचलती
समय की हर करवट
प्रयासों की असफलता देती जाती
कुंठाऔ भरी जिन्दगी
कि असमय ही मरता रहता
तन भी ओर मन भी
गीता के श्लोक हो जाते सारहीन
ओर भटकाव हो जाता सारवान
कि उपेक्षा की आग
धधक ज्वाला बनती
जिसके तपन की लौ
घनी हो चुकी प्रबल
सरकारों का आश्वासन
केवल चुनावी घोषणा
बडा भटकाव हैं यह
युग का सच
यही से जन्म पाता
विषमता का बीज
असंख्य युवाओ का भविष्य
शिक्षा प्रणाली
ओर हमारे शिक्षा विद
अंधेरे की गर्त
धकलते जाते
अनचाहे भी ओर चाहे भी
बचाने को अपना अस्तित्व
कि काबिज रह सके
अपना वर्चस्व
और समृद्धता
वर्गवाद के अंत का बिगुल
युवाओं को बजाना होगा
हताशा जीवन नहीं
मृत्यु ही हैं।
छगन लाल गर्ग।