समझने लगा अपनी औकात
पर कैसे रहूँ अज्ञानी
अज्ञेयता अपाहिज की निशानी
इसी कारण
नित्य उठते ही सवेरे
बुलाता हूँ अपने भरोसेमंद विद्वान
ओर लेता काम उनसे
प्रलोभन के बदले मिलते शब्द
ओर उनसे मांजता जाता
अपनी बौद्धिकता
अब यह शब्दो की तीक्ष्णता कहां मेरी
लिखी लिखाई रटी रटाई
ओर बेसमझी भरी पर काम की
इसी बदौलत बना विशेषज्ञ भाषा का
अब जुबान काम तीक्ष्ण
मानवीय मर्म काम ज्ञाता
असलियत बोध ढकने का पारखी
समझता हूँ बहुत गहरे मेरी कमजोरी
पर जीने लगा अडचन
असीम अध्ययन की डिग्री का सच
नही बन सकता यथार्थ का सच
ओर यही कारण
असल मात्र मेरे भीतर बसता
ओर बेतहाशा पीर पाता हूँ मैं
असलियत अज्ञात मै
कोई कसे तार मेरे
सटकते बोल उठेंगे सच
सूखे हुए तर्क कहां पायेंगे रस
पथरीले विचारो पर
कैसे उग पायेंगे चेतना के वृक्ष
बडा बेचैन हूँ
बनावटीपन का पात्र निभाते हारा थका
कहता जाता
कसो मेरी चेतना के तार
मै स्वाभाविक मानव बनना चाहता ।
छगन लाल गर्ग ।
पर कैसे रहूँ अज्ञानी
अज्ञेयता अपाहिज की निशानी
इसी कारण
नित्य उठते ही सवेरे
बुलाता हूँ अपने भरोसेमंद विद्वान
ओर लेता काम उनसे
प्रलोभन के बदले मिलते शब्द
ओर उनसे मांजता जाता
अपनी बौद्धिकता
अब यह शब्दो की तीक्ष्णता कहां मेरी
लिखी लिखाई रटी रटाई
ओर बेसमझी भरी पर काम की
इसी बदौलत बना विशेषज्ञ भाषा का
अब जुबान काम तीक्ष्ण
मानवीय मर्म काम ज्ञाता
असलियत बोध ढकने का पारखी
समझता हूँ बहुत गहरे मेरी कमजोरी
पर जीने लगा अडचन
असीम अध्ययन की डिग्री का सच
नही बन सकता यथार्थ का सच
ओर यही कारण
असल मात्र मेरे भीतर बसता
ओर बेतहाशा पीर पाता हूँ मैं
असलियत अज्ञात मै
कोई कसे तार मेरे
सटकते बोल उठेंगे सच
सूखे हुए तर्क कहां पायेंगे रस
पथरीले विचारो पर
कैसे उग पायेंगे चेतना के वृक्ष
बडा बेचैन हूँ
बनावटीपन का पात्र निभाते हारा थका
कहता जाता
कसो मेरी चेतना के तार
मै स्वाभाविक मानव बनना चाहता ।
छगन लाल गर्ग ।