Friday, June 3, 2016

दर्शन प्यास

समझता हूँ मैं तुम्हारी 
दर्शन प्यास
मंदिर सीढ़ीयों चढते पाता 
आवेग श्रृद्धा भरा समर्पण असीम 
ओर तुम्हारा बढ़े पेट भी
लगभग कडक कपाट सा गिरना
मूर्ति के आगे दंडवत होना
बड़ा कठिन योगाभ्यास कर लेते
साधना के मर्मज्ञ साधक
जानना नहीं रहा बाकी तुम्हें 
सभी जानते करते तुम्हें 
ठठाकेदार घरानों के धनी
आम व्यक्ति का सपना हो तुम 
विस्तार का दबदबा तुम्हारा
प्रजातंत्र के असली पहरेदार
यहां मंदिर भी तुम्हारे स्वागत मे तत्पर
आरती का करते इंतजार 
तुम्हारे आने तक
ओर सामान्य की भीड बीच 
कैसे प्रवेश कर जाते प्रभु मूर्ति पास
फिर वहीं तुम्हारा योगाभ्यास
झुकना ओर लंबवत हो जाना
अधिकांश को कर देता मंदिर बाहर 
ओर तभी आपके हाथों 
जल उठते मंदिर के दीये
होने लगता आधुनिक यांत्रिक कीर्तन 
आरती ओर वाद्ध्य संगीत 
ईश्वरीय रश्मियां प्रतिबिम्बित होकर
खोलती जाती कपाट चेतना के
युगो के बंद 
भभकती चिंगारी जलाने लगी 
अहंकार जंग का कचरा
ओर दीये ओर अधिक ऊर्जावान हुए 
मिटाने लगे अज्ञान वर्ग की मीनार
शायद सच होने लग गया
निर्मल आकाश तुल्य पृथ्वी का सपना 
आध्यात्मिक क्षेत्र अब तो पहचान आती
अपनी ओकात
पर नहीं रहना चाहता अपाहिज
बौद्धिक क्षमता मांजता जाता
बनता तीक्षण
नुकुली चुभन देती अस्मिता ज्ञानी की तरह
आखिर बोध असलियत अब दिखने लगी
बाहर भी भीतर भी
छगन लाल गर्ग