अब कैसे करे
अरमानों की बात
पिसती जाती हर आस्था
स्वार्थ के क्रूर पहियों तले
नहीं रहा विश्वास का कतरा
कि दे आस्था
अपनें हुओ की
फिसलते रहते हर सत्य
स्वार्थ की चिकनाहट से
कि चलना हुआ जाता
चमक देती रोशनी की तरफ
जहां कुचले जाते सपने
विश्वासो के
सत्य करता चाकरी
चाटुकारों की
शर्म आती बात करते
असूलों ओर इंसानियत की
नहीं कोई
जो दे सके हमदर्दी
टूटते जाते जीवन मूल्यों
ओर आस्थाओं को
लगता है
बिना करवट लिए
युग का सत्य समझाना
हमारा बेबूझ ठहराव
दम घौ ट देगा।
छगन लाल गर्ग।
अरमानों की बात
पिसती जाती हर आस्था
स्वार्थ के क्रूर पहियों तले
नहीं रहा विश्वास का कतरा
कि दे आस्था
अपनें हुओ की
फिसलते रहते हर सत्य
स्वार्थ की चिकनाहट से
कि चलना हुआ जाता
चमक देती रोशनी की तरफ
जहां कुचले जाते सपने
विश्वासो के
सत्य करता चाकरी
चाटुकारों की
शर्म आती बात करते
असूलों ओर इंसानियत की
नहीं कोई
जो दे सके हमदर्दी
टूटते जाते जीवन मूल्यों
ओर आस्थाओं को
लगता है
बिना करवट लिए
युग का सत्य समझाना
हमारा बेबूझ ठहराव
दम घौ ट देगा।
छगन लाल गर्ग।