यह तन
विभोर सा
तंरग घिरा
बदल देता
अपनत्व
नही कहता
यथार्थ
जिससे मिला परिणाम
विभोरता
यह नशा आत्मलिनता
परखे बिना
शात्विक मानू भी कैसे
कि सफलता की
सीढ़ीयो का सच
मेरा अपना
या कि
हजारों की बद् दुआओ से
फलीभूत होकर
कृत्रिम दिखावे मे
श्वास लेता
रोशनी के बनावटी बल्बो
की चकाचौंध हुआ
विभोर हुआ
नाचता हैं
अन्यो के हक का
छलावा लिए
अपना किए
इतराता तन
विभोरता नही
विकृति हैं
जो उभरी मानवता का
मजाक हैं
एक इन्च ही सही
मुस्कान
अपने दम तो मिले ।
छगन लाल गर्ग।
विभोर सा
तंरग घिरा
बदल देता
अपनत्व
नही कहता
यथार्थ
जिससे मिला परिणाम
विभोरता
यह नशा आत्मलिनता
परखे बिना
शात्विक मानू भी कैसे
कि सफलता की
सीढ़ीयो का सच
मेरा अपना
या कि
हजारों की बद् दुआओ से
फलीभूत होकर
कृत्रिम दिखावे मे
श्वास लेता
रोशनी के बनावटी बल्बो
की चकाचौंध हुआ
विभोर हुआ
नाचता हैं
अन्यो के हक का
छलावा लिए
अपना किए
इतराता तन
विभोरता नही
विकृति हैं
जो उभरी मानवता का
मजाक हैं
एक इन्च ही सही
मुस्कान
अपने दम तो मिले ।
छगन लाल गर्ग।