Sunday, June 12, 2016

यह तन

यह तन
विभोर सा
तंरग घिरा
बदल देता 
अपनत्व
नही कहता
यथार्थ
जिससे मिला परिणाम
विभोरता
यह नशा आत्मलिनता
परखे बिना
शात्विक मानू भी कैसे
कि सफलता की
सीढ़ीयो का सच
मेरा अपना
या कि
हजारों की बद् दुआओ से
फलीभूत होकर
कृत्रिम दिखावे मे
श्वास लेता
रोशनी के बनावटी बल्बो
की चकाचौंध हुआ
विभोर हुआ
नाचता हैं
अन्यो के हक का
छलावा लिए
अपना किए
इतराता तन
विभोरता नही
विकृति हैं
जो उभरी मानवता का
मजाक हैं
एक इन्च ही सही
मुस्कान
अपने दम तो मिले ।
छगन लाल गर्ग।