Friday, June 10, 2016

स्नेह नीर

होता नहीं अपना
हर उजाला 
भाते कतरे 
देते है पीडा अटूट
जीवन बन जाता
अचेतन का कुआँ
रीतता जाता
स्नेह नीर
कि नहीं करते
उजाले रूख फिर
विरल बना अंधकार
डूबो देता स्वाभाविक
रोशनी की दुनिया
नहीं मत ढूंढो
मोह के सागर
नहीं है सत्य यह
चाही रोशनी देती
संतापो की दुनिया
झलकता हर कतरा
रोशनी नही
अंश का क्षणिक सार
जो अस्तित्व हीन आभा
बिखेर करता विमोहित
जुगनू बन
मुडो न थोडे भीतर
देखो तो
उजाले का सर्जक
अति रमणीय आभा
किये बंद
अंतर की परतो मे
बुलाता है
हमारा अपना
अलौकिक सौन्दर्य लिए
फक्त एक बार का
मुड जाना
जीवन का अमोलक
सौन्दर्य स्वत हमारा
ओर तब चेतना
अपने द्वार खोले
स्मित मोहक
मुस्कान देकर
दृष्टि भेद का
अंतर्जाल भेदती
हर कतरा उजाला
करती अपना करती
विकट भीड नहीं
केवल अपना सौन्दर्य।
छगन लाल गर्ग।