होता नहीं अपना
हर उजाला
भाते कतरे
देते है पीडा अटूट
जीवन बन जाता
अचेतन का कुआँ
रीतता जाता
स्नेह नीर
कि नहीं करते
उजाले रूख फिर
विरल बना अंधकार
डूबो देता स्वाभाविक
रोशनी की दुनिया
नहीं मत ढूंढो
मोह के सागर
नहीं है सत्य यह
चाही रोशनी देती
संतापो की दुनिया
झलकता हर कतरा
रोशनी नही
अंश का क्षणिक सार
जो अस्तित्व हीन आभा
बिखेर करता विमोहित
जुगनू बन
मुडो न थोडे भीतर
देखो तो
उजाले का सर्जक
अति रमणीय आभा
किये बंद
अंतर की परतो मे
बुलाता है
हमारा अपना
अलौकिक सौन्दर्य लिए
फक्त एक बार का
मुड जाना
जीवन का अमोलक
सौन्दर्य स्वत हमारा
ओर तब चेतना
अपने द्वार खोले
स्मित मोहक
मुस्कान देकर
दृष्टि भेद का
अंतर्जाल भेदती
हर कतरा उजाला
करती अपना करती
विकट भीड नहीं
केवल अपना सौन्दर्य।
छगन लाल गर्ग।
हर उजाला
भाते कतरे
देते है पीडा अटूट
जीवन बन जाता
अचेतन का कुआँ
रीतता जाता
स्नेह नीर
कि नहीं करते
उजाले रूख फिर
विरल बना अंधकार
डूबो देता स्वाभाविक
रोशनी की दुनिया
नहीं मत ढूंढो
मोह के सागर
नहीं है सत्य यह
चाही रोशनी देती
संतापो की दुनिया
झलकता हर कतरा
रोशनी नही
अंश का क्षणिक सार
जो अस्तित्व हीन आभा
बिखेर करता विमोहित
जुगनू बन
मुडो न थोडे भीतर
देखो तो
उजाले का सर्जक
अति रमणीय आभा
किये बंद
अंतर की परतो मे
बुलाता है
हमारा अपना
अलौकिक सौन्दर्य लिए
फक्त एक बार का
मुड जाना
जीवन का अमोलक
सौन्दर्य स्वत हमारा
ओर तब चेतना
अपने द्वार खोले
स्मित मोहक
मुस्कान देकर
दृष्टि भेद का
अंतर्जाल भेदती
हर कतरा उजाला
करती अपना करती
विकट भीड नहीं
केवल अपना सौन्दर्य।
छगन लाल गर्ग।