Saturday, June 11, 2016

तलाश बाकी

मुश्किल हैं अर्थ देना
जीवन के प्रगाढ सत्यो को
खप जाते हैं जीवन 
अर्थ ढूँढते
यह रहस्यमय ब्रह्माण्ड
नापते हैं हम
सामर्थ्य हीन विवेक से
जो खुद का सृजित भी नहीं 
पाया पुरखो के सृजन से
उसी प्रज्ञा चम्मच को
पकडे हैं अपनी किए
जी जान से
दोनों हाथों मजबूती से
कि छिन ना ले कोई ओर
नित नापते जा रहे
विशाल रहस्यो भरा
अथाह ज्ञान का रहस्यमय 
सागर 
कैसे होगा यह
उपाय मात्र यह
तरीके बदलने होगे
कुछ अपना जोडना होगा 
चम्मच फैक कर
अंतर के विशाल सागर 
बेबूझी से 
कूदना होगा 
मोती रहस्य वहीं हैं 
तलाश बाकी हैं
छगन लाल गर्ग।