Friday, June 10, 2016

ठिठुरन

ठिठुरन देती हैं हवाऐ
ओर ठिठुरता सौन्दर्य 
ढकता जाता है सौन्दर्य तन का उघडा भाग
वह भी जो नूर रहा उसका
कि रुकते हैं लोग 
दो घडी
पाना चाहते हैं उम्मीदो का खजाना
छलकते ऑखो के नशे से
ओर बेकाबू करते चेहरे के नूर से
सौन्दर्य का यह दृश्य
हवाओं की मार से बचा हुआ
ढका हैं
यह ढकाव
भीतरी उम्मीदें नकारता जीता हैं
परिस्थिति वस
वरना अपना उठाव का झंडा
कोन छुपाता हैं
छटपटाहट तो हैं पर ठंडी हवाओ का रूख
घूटन देता भीतर तक
प्रतिक्रिया करता सौन्दर्य
ढकाव के सतरंगी वस्त्र
मैल खाते सौन्दर्य से ओढता है
तस्सली होती हैं
एकरूपता का अहसास पाये
चुभता जाता
उसी अदा उसी नजाकत
ढकाव उसका ढकोसला ही सही
भीतर बाहर के अंतर को अंजाम देता हैं
ओर वह बार बार
कुरूपता को तमाशा दिये
बढता जाता है
रौदता हुआ बेशुमार दुनिया
यह दृश्य मेरी कसक बनता ओर अधिक
देखता हूँ सड़क किनारे
गंदगी के अंबार का जलता धुऑ
रोती ऑखो पीते
गरमाहट लेते
प्रकृति के निरापद सौन्दर्य को
उघडे लावण्य को विवशता से
लिपटे सौन्दर्य को
नजदीक गुजरते देखते हैं
सम्भावनाओ की हवाऐ
बहेगी
सोचता हुआ बढता हूँ
मेरा अपना जीवन जीने।
छगन लाल गर्ग।