बीती रात फिर आओ तो
सूने अम्बर घिर जाओ तो
हृदय पनघट नीर घना हैं
एक बार फिर डूबकी लगाओ तो
फिर हलचल हो जाये थोड़ी
रसगागर ढुलकाओ तो
फिर नव रस श्रृगार सजाकर
अधर राग अमन्द पिलाओ तो
विहाग राग मत आने दो प्रियतम
करूणा नद घना बहाओ तो ।
छगनलाल गर्ग ।
सूने अम्बर घिर जाओ तो
हृदय पनघट नीर घना हैं
एक बार फिर डूबकी लगाओ तो
फिर हलचल हो जाये थोड़ी
रसगागर ढुलकाओ तो
फिर नव रस श्रृगार सजाकर
अधर राग अमन्द पिलाओ तो
विहाग राग मत आने दो प्रियतम
करूणा नद घना बहाओ तो ।
छगनलाल गर्ग ।