Sunday, June 12, 2016

अंकुरित

सृजक मेरे 
अंकुरित पल्लवित 
तूने किया 
सामर्थ्य बिना भी
खूब दिया 
कि लगता पक्षपात हुआ 
ओरो से
कहां दी क्षमता मुझे 
कि इतना घना सुख झेलू
कारण यही 
मात्र यही 
कि दुख का भाव चखू
दो अक्टूबर का दिन आज 
तेरे चित्रित चितेरे
आये जमी पर
पुष्प महके
हिन्दुस्तान महका
नमन पहले तुझे मेरे प्रभु
तेरी झलक धरा को मिली
सब कर्म था तेरा
तू जमी पर इस रूप आया 
आओ मेरे सृजक
एक बार फिर 
भारतीय के दिल मे
महक बनकर
गुलिस्ता फिर महके
महक भारतीयो की
घनीभूत हो
जग का रीता 
ऑचल भर दे
मेरे सृजक देखो भक्त तुम्हारा
समर्पित हुआ तूझमे
भीतरी तंत्री से याचना बद्ध हैं
छगनलाल गर्ग।