Friday, June 10, 2016

निर्मल राग

स्वीकारना होगा
अन्तर्मन उपजा सत्य
विवेक की आधार शिला
भटकावो का भंवर देती
अधिक उलझाती जिन्दगी
अवधारणाओं का उदय हमारा नहीं
जनमानस का जीया निछोड
पाया है अस्तित्व
मौलिक सत्य भीतर पाता है विस्तार
नही विवेक की सत्ता
कि तुला से तुले सत्य
सरलता का बहाव लिए
भावनाओ का नमनीय द्रव्य
तंरगित लहर के साथ
भीतर ही भीतर आत्मीय चेतन
सौन्दर्य बिखेरता बहता है सत्य
यह चेतन गणित नही
कि परिणाम पाया इठलाये
एक अनुपम क्षण
जीवंत हुआ दे जाता है सार
समूचे जीवन का
यह वही प्रथम किरण है स्नेह की
बन जाती अमोलक धरोहर
कि मात्र
स्मृति की पुलक भर देती
जिन्दगी का गूढ रहस्य
वही क्षण बन जाते प्रार्थना
निर्मल राग स्नेहिल होते
सृष्टि का वही क्षण
नेह हुआ बंध जाता
अलौकिक अदृश्य से
यहां न रहते है शब्द
नही अस्तित्व विवेक का
रह जाता केवल सत्य
केवल प्रेम।
छगन लाल गर्ग।