अब ले चल
भर गया पूरा बहुत पाया
राग ने खूब दौडाया
नहीं पा सका तनिक भी
विश्राम
बहुत हुआ जीवन
अब नहीं जाता दौडा
ओर बिना दौडे संसार क्या करूं
जर्जर देह कैसे रहना हो
नाविक मेरे
संसार सागर बेबूझ रहा
बहुत डूबा उतराया
हांफता रहा मोहक जाल
उपर उपर नाव तेरी
नहीं डूबा संकट
तेरी नाव से बचता रहा
चलती रही सुरक्षित रहा
भीगा कहां दर्द पराये
केवल स्वयं की वासना
लिपटा रहा दुर्गंध भरता रहा
देह गेह बेकार रहा
तृष्णा ठगनी भाती रही
अनुकंपा तेरी नहीं रही
झूठ में सत्य करता रहा आरोपित
कोलाहाल घीरा सुनता रहा
नीरवता नहीं पाया
निश्छल व्यक्ति रोता रहा
ओर मैं विमोहित हुआ हंसता रहा
निर्बल बना सामर्थ्य हीन
पीसता रहा छलावे के भीषण
क्रूर दोनों हाथों
नहीं कर पाया कुछ सामर्थ्य हीन
यह नहीं की संवेदना ना उठी
हूई घनी तपिस पर नहीं बन सका
अतिशय ताप पाया बादल
बरसने लायक
टीन के बर्तन सा गर्माहट पाया
निरंतर जलता रहा जर्जर हुआ
नहीं आ सका निर्बल
ओर आज हारा थका बिना काम का
निरर्थक स्वयं से घीन भरा
आत्म ग्लानि लिए मुश्किल जीना
अब ले चल
बहुत हुआ जीवन ।
भर गया पूरा बहुत पाया
राग ने खूब दौडाया
नहीं पा सका तनिक भी
विश्राम
बहुत हुआ जीवन
अब नहीं जाता दौडा
ओर बिना दौडे संसार क्या करूं
जर्जर देह कैसे रहना हो
नाविक मेरे
संसार सागर बेबूझ रहा
बहुत डूबा उतराया
हांफता रहा मोहक जाल
उपर उपर नाव तेरी
नहीं डूबा संकट
तेरी नाव से बचता रहा
चलती रही सुरक्षित रहा
भीगा कहां दर्द पराये
केवल स्वयं की वासना
लिपटा रहा दुर्गंध भरता रहा
देह गेह बेकार रहा
तृष्णा ठगनी भाती रही
अनुकंपा तेरी नहीं रही
झूठ में सत्य करता रहा आरोपित
कोलाहाल घीरा सुनता रहा
नीरवता नहीं पाया
निश्छल व्यक्ति रोता रहा
ओर मैं विमोहित हुआ हंसता रहा
निर्बल बना सामर्थ्य हीन
पीसता रहा छलावे के भीषण
क्रूर दोनों हाथों
नहीं कर पाया कुछ सामर्थ्य हीन
यह नहीं की संवेदना ना उठी
हूई घनी तपिस पर नहीं बन सका
अतिशय ताप पाया बादल
बरसने लायक
टीन के बर्तन सा गर्माहट पाया
निरंतर जलता रहा जर्जर हुआ
नहीं आ सका निर्बल
ओर आज हारा थका बिना काम का
निरर्थक स्वयं से घीन भरा
आत्म ग्लानि लिए मुश्किल जीना
अब ले चल
बहुत हुआ जीवन ।