Friday, June 3, 2016

कहने दो

कहने दो
अंतरमन की कसक
काल कलवित वेदना यह
बहाव चाहती
मत रोको 
विडंबना का राज शायद 
उकेरने निमित्त 
उठती भीतर की हूक
हुई जाती घनी प्रबल
शब्द नहीं देते साथ 
हुई घनी द्रवीभूत 
पाये कैसे आकार पीडा सा
राग स्वर वेदना व्यथित 
हुआ जाता अस्तित्व मेरा
व्यञ्जन शक्ति नहीं सार्थक 
अभिव्यक्ति निमित्त 
क्या हो निशब्द चलने दो
विरह राग प्रवाह होने दो 
निर्मल मन
अतिसार हुआ जाता अब
विदेह मिलन
अबाध निरंतर आते हो तुम 
कर देते क्षुब्ध व्यथित हृदय मेरा
अपार शिथिल शान्त व्यथा 
कर जाते लघु
अब पहचानने लग गया तुम्हें 
अदृश्य रूप भी तुम्हारा
होने लगा अहसास 
ओर भी नाना रूप लेते 
करते रहते क्रीड़ा घनी तुम 
मेरे अपने
नहीं दे पाये ना तुम 
धोखा मुझे
कोई भी रूप करो धारण
हर रूप तुम्हारा लुभाता मुझे
कभी सुरभि बन फैलते वायु संग
कभी दुर्गंध बन जाते मौत की
वाह अब तो 
गये तुम मेरे घर
मेरे आंगन मेरी कोख
आह कैसी यह परीक्षा मेरी 
मेरे अदृश्य इतराने लायक 
भाग्य दिया मुझे 
कि समझा तूने मुझे 
परीक्षा लायक
छगन लाल गर्ग