विडंबना
पकडती निर्बल
हर और का
आक्रमण
झकझोर देती
गति नियमित
लाचार जीवन
बन जाता कुंठित
नहीं मिलते कहीं
संवेदना के बोल
कि बढाये हौसला
आश्चर्य तब होता
विडंबना कहीं और से नहीं
अपनो की भेजी
साबित करती वर्चस्व अपना
गांठ बांधी हमारी ही पूंजी
जो कभी हमने
सामर्थ्य के चलते
साबित करने खुद को
भेजी
आज दुर्दिन बनी
हमे ही स्वाद अपना
चखाती पुनर्रावर्तन हुई
नहीं उठापटक
कहीं ओर से नही
हमसे ही पाती है अस्तित्व।
छगन लाल गर्ग।
पकडती निर्बल
हर और का
आक्रमण
झकझोर देती
गति नियमित
लाचार जीवन
बन जाता कुंठित
नहीं मिलते कहीं
संवेदना के बोल
कि बढाये हौसला
आश्चर्य तब होता
विडंबना कहीं और से नहीं
अपनो की भेजी
साबित करती वर्चस्व अपना
गांठ बांधी हमारी ही पूंजी
जो कभी हमने
सामर्थ्य के चलते
साबित करने खुद को
भेजी
आज दुर्दिन बनी
हमे ही स्वाद अपना
चखाती पुनर्रावर्तन हुई
नहीं उठापटक
कहीं ओर से नही
हमसे ही पाती है अस्तित्व।
छगन लाल गर्ग।