Friday, June 3, 2016

सौन्दर्य

जानता हूँ यह
पूर्णता नहीं 
जमीन व्याप्त सौन्दर्य 
केवल अंश ओर वह भी
उधार पाया 
ससीम भी लघु भी
अलौकिक सौन्दर्य सागर
परमात्मा से
आत्मा कहां पाती तुष्टता 
स्नेह सागर सी
केवल तन तुष्टि तृष्णामय मोह
देखता जमीन का सौन्दर्य 
सत्य ओर होगा 
आता रहता अहसासों में
बिजली वेग से
झलक निरखते ही 
अनुपम सा 
हृदय में जगमगाहट देता 
खो जाता अचेतन
ओर अतृप्त नयनों का नूर
तलाशता रहता 
जमीन पर बिखरे 
मनमोहक सौन्दर्य बीच 
अनुभूति का सौन्दर्य 
कहते तुम 
अजीब अभिव्यक्ति देते
धरातलीय सौन्दर्य पहुँचा देते
आसमान तक
चाँद तारों तक
कहो तुम तुम्हारी विवशता 
नारी कुसुम का महकता तन
गुलाब या कमल
ओर भी देते रहो 
केवल उपमा अद्वितीय 
इससे होगा क्या 
मन बहलेगा तुम्हारा 
या कि जिसे सुनाते तुम
यह सब अचेतन अनुभूति की 
छाया मात्र 
असलियत कहां 
फिर होना पडता सारोबार
समय की करवटो के साथ 
आत्म ग्लानि से द्रवित
ओर तब 
समय पंछी की यात्रा का
आखिरी पड़ाव 
मांगता हिसाब 
जीवन जीने का
सौन्दर्य हीन भ्रमित अतीत 
नहीं रख सका कुछ संचित 
देने योग्य 
मंजिल की सीढ़ीयां पर
थिरकते कदम 
पश्चाताप का जप करते
बढ़ते पर पाएँगे क्या 
संचय सौन्दर्य जीवन सार 
अलौकिक सौन्दर्य की झलक
केवल आभासित देती गति 
वहां जहां बिखरा घना 
शांत गंभीर शीतल ओर
आत्मलीन स्नेहिल सौन्दर्य 
बुलाता अनंत की ओर
छगन लाल गर्ग