Sunday, June 12, 2016

मित मेरे

मित मेरे 
बहो अविरल 
नेह सरिता ले निर्मल 
अचेतन मन की गहन गहराई 
बहे राग तुम्हारा
जहाँ विडंबना का अथाह
सागर उत्पीड़न ज्वार तपन
गर्माया उफनता हैं
विशाल विस्तार उसका
अनन्त गहरा
चेतन तंरगो को मिटाता सा
स्थिर हुआ हैं
बना हैं जीवन
विडंबना का कोष अथाह
भरा भरा उफनता सा
कोई कोना अछूता नहीं
मन का
विडंबनाओ के जाल से
जीता जाता भार तले दबा जीवन
बहो तुम नेह मित
हृदय भरो
अंकुरण पल्लवन लो
कि नेह बीज विकास हो
पौधा बन फले
अंतर पुकार सुनो मित मेरे
आओ तो पावन नेह नीड
विश्राम पाये जीवन मेरा
सुलग जाता हैं जीवन
ज्वलंत विडंबना के आगोश मे
पदचाप ध्वनि सुनता तुम्हारी
भीतर द्वार दस्तक पाता हूँ
खटखटाहट द्वार पर
खनक कानों गूँजी हैं
लगता वक्त करवट ली हैं
बहना तुम्हारा
हृदय संचित चाहता हैं
मित मेरे आओ तो
विलय पाऊ जीवन लिए
घनी आँकाक्षाओ के चितेरे
तोलो मुझे
कि संवेदना भार बने
नेह आधार बने ।
छगन लाल गर्ग।