पुनरूक्ति हैं जीवन
लगता आना व्यर्थ रहा
दोहराता वहीं वहीं
जो चाहता नहीं
पिरोये फूलों का
हार नहीं जीवन
उजडे उपवन की स्मृति हैं
एक अनन्त श्रृखला
टूटते विश्वासो की
कसोट भारी
जिसे न चाहे चाहना हैं
शायद यही राह
शाश्वतता की ओर जाती हो
शायद प्राण
अनन्त की गहनता से जुड़े ।
छगनलाल गर्ग।
लगता आना व्यर्थ रहा
दोहराता वहीं वहीं
जो चाहता नहीं
पिरोये फूलों का
हार नहीं जीवन
उजडे उपवन की स्मृति हैं
एक अनन्त श्रृखला
टूटते विश्वासो की
कसोट भारी
जिसे न चाहे चाहना हैं
शायद यही राह
शाश्वतता की ओर जाती हो
शायद प्राण
अनन्त की गहनता से जुड़े ।
छगनलाल गर्ग।