Friday, June 3, 2016

खूबसूरती

खूबसूरती करती मोहित 
आशक्त हूँ मैं 
नशीला रूप मादक यौवन 
सुरभि बिखेरता तन तुम्हारा
मधु हलाहल का हिलोर लेता 
असीम गहरा दरिया 
खो गया संपूर्ण अस्तित्व 
नहीं रहा मैं 
समर्पित मन वासना गंध से 
उतेजित उन्मादित
बहुत विशाल सृजन का स्वामित्व 
मन करता जाता सवारी
सौन्दर्य के अथाह घनत्व पर
पर कहीं हल्की सी खरांच
उभरती दर्द की जलती लकीर
दागती जाती हृदय का कोमल अंश
करती घात आत्मा पर
नहीं शरीर सौन्दर्य से नाता
आत्मा का
अनंत फासला 
आत्मा ओर शरीर बीच 
सौन्दर्य शरीर केवल 
झरोखा बना
असलियत की झलक का
मत समझना इसे सर्वांग
अतुलनीय दुराव 
आत्मा शरीर बीच 
पाटना असंभव
मत रूको इसी सौन्दर्य 
सीढ़ी केवल यह 
संकेत करती
परम का
मत रूको मेरे प्राण 
शरीर सौन्दर्य 
रहोगे क्या पास बूझते भी
शरीर का सामीप्य बनाता
आत्मा से फासला
ओर सत्य 
तरसता प्राण चाहता
परमानंद परमात्मा तुल्य
रहो ना समीप आत्मा के
हो सकोगे
दूर तन सौन्दर्य 
स्वतः अलगाव ओर परिणाम 
सघन चिर आनंद आत्म सौन्दर्य 
मेरे प्राण 
नहीं चाहता संसारी छलभरा
सौन्दर्य जो देता तृष्णा रस केवल क्षणिक
छगन लाल गर्ग