बूझते दीये
जीना चाहते अंतिम पल
समूची अवशेष ऊर्जा
घनीभूत
जीजीविषा आस
करती आखिरी प्रयास
नहीं दिखता
अन्तराल
तन ओर चेतना बीच
स्व भूला
अस्तित्व अब
केवल चाह
नीजता का दीया
जलता रहे
यह अवस्था
स्व बोध ज्ञान
जहाँ अंकुर फूटता अग्रिम
यात्रा का
बुझना भी एक विलय
अंधकार में
प्राप्ति नव ऊर्जा
बिना बुझे कैसे संभव
ताजी रोशनी का उदित होना
हर पदार्थ की विलुप्त दशा
संकेत देती नव निर्माण
बूझना जलना ही शास्वत
ओर तभी भरते
जगत के प्रकृति के ओर
नव सृजन के
रंगीन नव मृदु कुसुम ।
छगन लाल गर्ग ।
जीना चाहते अंतिम पल
समूची अवशेष ऊर्जा
घनीभूत
जीजीविषा आस
करती आखिरी प्रयास
नहीं दिखता
अन्तराल
तन ओर चेतना बीच
स्व भूला
अस्तित्व अब
केवल चाह
नीजता का दीया
जलता रहे
यह अवस्था
स्व बोध ज्ञान
जहाँ अंकुर फूटता अग्रिम
यात्रा का
बुझना भी एक विलय
अंधकार में
प्राप्ति नव ऊर्जा
बिना बुझे कैसे संभव
ताजी रोशनी का उदित होना
हर पदार्थ की विलुप्त दशा
संकेत देती नव निर्माण
बूझना जलना ही शास्वत
ओर तभी भरते
जगत के प्रकृति के ओर
नव सृजन के
रंगीन नव मृदु कुसुम ।
छगन लाल गर्ग ।