कब उड जाये
नहीं भरोसा
मेरा गगन पंछी
वासना का कीडा
खोदता जाता
कच्ची देह
ढहना तो निश्चय
पर अब यह
बंदोबस्त
वासना का
लिपटता जाता
शिकारी का जाल बना
ओर तृष्णा का कोवा
अकडता जाता
बेहोशी भरा
अपार सुखो का अंबार
लेता जीवन अंगडाई
नहीं दिखता अटल सत्य
जो घटता
नित्य आसपास
नष्ट होती प्रकृति
पशु मानव पेड पौधे
हर सजीव चेतनता
पर जीवन मद
इतना गहराया
मनोमस्तिष्क
नहीं होता विश्वास
मृत्यु पर
अवास्तविक वस्तु
प्रभाव देती
स्वप्न बनकर
ओर हम जीवन समझें
कि ऑख खुल खुल जाती
ओर स्वप्न रौद देती चेतन दशा
न चेतन न अचेतन
संसार का मद समझने देता
ओर बेबूझ ही
कच्ची देह
दीवार ढहती जाती
पंछी उड ना जाये
दीवार ढह ना जाये
कि कर ले अभ्यास
मेरे प्राण
अस्तित्व समर्पण की तैयारी
वास्तविक कुछ नहीं
केवल
माया मोह के विचार का
समर्पण ।
छगन लाल गर्ग ।
नहीं भरोसा
मेरा गगन पंछी
वासना का कीडा
खोदता जाता
कच्ची देह
ढहना तो निश्चय
पर अब यह
बंदोबस्त
वासना का
लिपटता जाता
शिकारी का जाल बना
ओर तृष्णा का कोवा
अकडता जाता
बेहोशी भरा
अपार सुखो का अंबार
लेता जीवन अंगडाई
नहीं दिखता अटल सत्य
जो घटता
नित्य आसपास
नष्ट होती प्रकृति
पशु मानव पेड पौधे
हर सजीव चेतनता
पर जीवन मद
इतना गहराया
मनोमस्तिष्क
नहीं होता विश्वास
मृत्यु पर
अवास्तविक वस्तु
प्रभाव देती
स्वप्न बनकर
ओर हम जीवन समझें
कि ऑख खुल खुल जाती
ओर स्वप्न रौद देती चेतन दशा
न चेतन न अचेतन
संसार का मद समझने देता
ओर बेबूझ ही
कच्ची देह
दीवार ढहती जाती
पंछी उड ना जाये
दीवार ढह ना जाये
कि कर ले अभ्यास
मेरे प्राण
अस्तित्व समर्पण की तैयारी
वास्तविक कुछ नहीं
केवल
माया मोह के विचार का
समर्पण ।
छगन लाल गर्ग ।